मंच का डर

वह नहाते समय गाती है। छत पर जाती है, तब गाती है। पहाड़ी रास्तों पर चलते हुए गाती है। और चाँद को गीत सुनाती है। चंपा को दुनिया की किसी भी दूसरी चीज़ से ज़्यादा गाना अच्छा लगता है।

वह शेर जैसी बुलंद आवाज़ में गाती है। मधुमक्खी-सा गुनगुनाती है। बारिश की रिमझिम फुहार में गाती है। चिलचिलाती गर्मी में सुर सजाती है। जब चंपा गाती है, तब उसकी आवाज़ उसके मन में एक सुखद भाव जगाती है।

एक दिन जब चंपा गाती है, तब बसंत की आँखों में चमक जाती है। “मुझे एक बहुत ही बढ़िया बात सूझी है!” वह कहता है।

बसंत चंपा का सबसे अच्छा दोस्त है, और उसे हरदम कुछ-न-कुछ सूझता रहता है। उसके कुछ विचार मज़ेदार होते हैं। और कुछ बिलकुल बेकार।

“तुम्हें स्कूल के वार्षिकोत्सव में गाना चाहिए।” बसंत ने कहा। “कैसा भयंकर सुझाव है!” चंपा बोली। “क्यों? गाओ न! तुम्हें तो गाना ख़ूब भाता है।” चंपा ने बसंत को नहीं बताया था कि वह सिर्फ़ एक ही बार मंच पर चढ़ी है और तब डर के मारे वह बेहोश होते-होते बची थी।

“मैं इतने सारे लोगों के सामने नहीं गा सकती। मैं तो माँ और पा के सामने भी नहीं गाती!“ “लेकिन तुम मेरे सामने तो गाती हो! बस तुम्हें थोड़ी-सी कोशिश करने की ज़रूरत है, चंपा।”

“सचमुच करनी चाहिए?” “हाँ! हाँ! हाँ!” और अगर माही और पारस ने मेरा मज़ाक उड़ाया?” अगर वह मज़ाक उड़ाएँगे, तो वह ख़ुद बेवकूफ़ कहलाएँगे। तुम तो एक शानदार गायिका हो।”

भीड़ के सामने गाने की बात सोचने भर से चंपा के मन में हलचल होने लगती। एक तरफ़ उसका मन ख़ुशी से फूला समाता और दूसरी तरफ़ उसका दिल घबराता। पर उसे तो गाने से बेहद लगाव है! आख़िरकार वह गाने की ठान लेती है।

चंपा जी तोड़ मेहनत करके गाने का अभ्यास करती है। नींद से जागती है तो धीमे-धीमे गुनगुनाती है।

गुणा-भाग करते समय भी सुर सजाती है।

बकरी को चराने ले जाते समय भी आवाज़ में उतार-चढ़ाव का रियाज़ करती है।

मुँह से अलाप लगाती है। नाक के पुट से तान सजाती है। गाते-गाते उलट-पलट हो जाती है।

घरवाले चंपा के मंच पर गाने को लेकर बड़े ख़ुश हैं। वह उसे सुझाव देते हैं। “मिर्च जलाकर नज़र उतारो! दही-पेड़ा या बारह अंगूर के दाने खाकर भाग्य सँवारो!” “सुनने वालों के सामने मुस्कुराहट बिखेरती रहो। जैसी हो वैसी रहो, बनावटी नहीं।” “गाने से पहले लम्बी और गहरी साँसें लो।”

कार्यक्रम से एक दिन पहले चंपा ख़ास रियाज़ करती है। रियाज़ बड़ा ही सफ़ल साबित होता है।

आख़िर ही जाता है वार्षिकोत्सव का दिन! चंपा वह स्वेटर पहनती है जो उसके दादाजी ने इस कार्यक्रम के लिए ख़ासतौर पर बुना है।

जब उसकी बारी आती है, तब जैसे उसकी ज़बान लड़खड़ाने लगती है। मंच बहुत विशाल लगने लगता है। बिजली की रोशनी से आँखें चौंधिया जाती हैं! सुनने वालों की भीड़ का डर सताता है। चंपा के गले से बोल नहीं फूटते और ठंडी हथेलियों से पसीना छूट जाता है।

सुनने वालों को देखकर मुस्कुराना उसे याद रहता है। लेकिन जब गाना शुरू करना चाहती है, तब आवाज़ फुसफुसाहट में बदल जाती है। ऐसा लगता है जैसे उसकी आवाज़ ही कोई निगल गया हो!

चंपा एक लम्बी और गहरी साँस लेती है, और दोबारा कोशिश करती है...

...और मुँह से एक दबी-सी कूक बाहर आती है। सुनने वालों की बेचैनी उनके चेहरों पर छा जाती है। चंपा का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगता है। धक! धक! धक! और सिर चकराने लगता है।

तभी उसे उचक-उचक कर हाथ हिलाता बसंत नज़र आता है। उसे देखते ही चंपा का हौसला बढ़ जाता है। वह फिर कोशिश करती है।

होठों से गीत के बोल फूटते हैं धीरे-धीरे। पहले आवाज़ कँपकँपाती है, फिर कुछ ठीक हो जाती है। फिर संगीत की धारा बह निकलती है चंपा के गले से मधुर, सुरीली और दमदार। अब मंच के बड़ा होने से फ़र्क नहीं पड़ता। तेज़ रोशनी सताती है। और ही सुनने वालों की भारी भीड़ का डर रह जाता है।

चंपा सुर छेड़ देती है, खुले गले से बेधड़क। और इसी के साथ उसके मन में भर जाता है दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत अहसास।

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मंच का डर (Hindi), translated by Deepa Tripathi, published by Pratham Books (© Pratham Books, 2018) based on the original story Stage Fright (English), written by Yamini Vijayan, illustrated by Somesh Kumar, published by Pratham Books (© Pratham Books, 2018) under a CC BY 4.0 license on StoryWeaver. Read, create and translate stories for free on www.storyweaver.org.in · View on StoryWeaver